ISRO

एएसएलवी

उत्थापन के समय 40 टन भारी व 23.8 मी. लंबे पांच चरणों वाले, पूर्णतः ठोस नोदक यान एएसएलवी को 400 कि.मी. वृत्तीय कक्षाओं में परिक्रमारत 150 कि.ग्रा. भारी उपग्रह श्रेणी के मिशनों के लिए संरूपित किया गया था।

संवर्धित उपग्रह प्रमोचन यान (एएसएलवी) को निम्न पृथ्वी कक्षा मिशनों के लिए एसएलवी-3 से तीन गुनी अधिक, 150 कि.ग्रा. नीतभार क्षमता संवर्धन के लिए अभिकल्पित किया गया था। एसएलवी-3 मिशनों से अर्जित अनुभवों को आधार पर बने एएसएलवी ने स्ट्रैपऑन प्रौद्योगिकी, जड़त्वीय दिशानिर्देशन, बल्बीय ताप कवच, लंबवत समाकलन तथा संवृत्त पाश निर्देशन जैसी भावी प्रमोचन वाहनों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन और उनके वैधीकरण हेतु कम लागत के मध्यवर्ती यान के रूप में अपनी उपयोगिता सिद्ध की थी।

एएसएलवी कार्यक्रम के अंतर्गत चार विकासात्मक उड़ानें आयोजित की गईं। पहली विकासात्मक उड़ान 24 मार्च, 1987 को तथा दूसरी 13 जुलाई 1988 को संपन्न हुई। 20 मई, 1992 को एएसएलवी-डी3 सफल प्रक्षेपण द्वारा 106 कि.ग्रा. भारी श्रोस-सी को 255 x 430 कि.मी. कक्षा में स्थापित किया गया। 4 मई, 1994 को प्रमोचित एएसएलवी-डी4 द्वारा 106 कि.ग्रा. भारी श्रोस-सी2 को कक्षा में स्थापित किया गया। इसमें दो नीतभार नामतः, गामा किरण प्रस्फोट(जीआरबी) परीक्षण तथा मंदन विभव विश्लेषक (आरपीए) लगे थे। इस उपग्रह ने सात साल तक काम किया।